एक औरत की डायरी से / उमा झुनझुनवाला
दिनांक - हरदम
तुम हमेशा कहते हो और कहते जाते हो....ज़िन्दगी की सच्चाई पर इतना लम्बा भाषण मैंने अब तक न तो किसी से सुना है और न ही पढ़ा l लेकिन तुम्हे सुनना अच्छा लगता है इसलिए सुनती चली जाती हूँ.....l अब तो मेरी दीवारों को भी तुम्हारे शब्द याद हो गए l दीवारों का शब्दों का अर्थ समझने का मतलब समझ रहे हो न...l
लेकिन आँखों देखा या कानो सुना या स्पर्श या सिर्फ स्वाद या महक ---
अलग अलग सत्य होने के बावजूद अक्सर अधुरा सत्य होते हैं--
अपने आप में पूर्ण नहीं भी होते हैं।
एक इन्द्रिय का सच पूरा सच नहीं होता..........
पाँचों इन्द्रियाँ जब कुछ महसूस करती हैं--एक साथ---
तो वो "परमात्मा 'को महसूस करना होता है
----------------सत्य होता है
-------पूरा सत्य---
मेरी समस्त इन्द्रियाँ तुम्हे महसूस करती रहती है "परमात्मा सा" हरदम