“एक औरत की डायरी से” को पढ़ना स्त्री की गहन पीड़ा से होकर गुजरने जैसा है। स्त्री के विश्वास और उसके टूटने और उससे उपजी त्रासदी को शब्द देना कि वह मुकम्मल बयान बन जाय, वाकई काबिले तारीफ है।यह डायरी से ज्यादा स्त्री की वेदना-संवेदना की अभिव्यक्ति का सम्मुच्य है। इसमें अमृता प्रीतम का सा अंदाजे बयां है तो फंतासी के करीब से होकर गुजरने का अहसास। लघुकथा का सा स्फोट। लेकिन पीड़ा का महाआख्यान। भाषा को बरतने की दक्षता चकित करती है। यह काफी समूची स्त्री का पोर्ट्रेट जैसा है । -- अवधेश प्रीत / कहानीकार
Friday, 30 June 2017
पिछली रात सोचा था रखेंगे एक टुकड़ा चाँद का अपने तकिये के नीचे
सुबह आँख खुली तो गालों पे अंकित था पूरा का पूरा चाँद
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